UP Chunav 2022: यूपी के प्रतापगढ़ की कुंडा सीट पर साल 1993 से लगातार रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया के परिवार का एक छत्र राज्य चला आ रहा है. निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर कुंडा विधानसभा सीट से जीतते रहे हैं. एक बाहुबली नेता की पहचान रखने वाले राजा भैया की कुंडा विधानसभा सीट पर ऐसी पकड़ है कि साल 2007 के विधानसभा चुनाव में तो विधानसभा क्षेत्र में हुए कुल मतदान के करीब आधे वोट उन्होंने ले लिए थे. पर अब इस बाहुबलि नेता को इन चुनावों में चुनौती मिलती दिख रही है. अखिलेश यादव की सपा ने 15 साल बाद राजा भैया के सामने उम्मीदवार उतारा दिया है. समाजवादी पार्टी की दूसरी सूची में कुंडा से समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी के तौर पर गुलशन यादव पर दांव लगाया गया है, जो कुंडा नगर पंचायत के पूर्व चेयरमैन रह चुके हैं. समाजवादी पार्टी की कल जारी 39 उम्मीदवारों की दूसरी सूची में उनका नाम शामिल है. गुलशन यादव खुद कुंडा में राजा भैया के करीबी रह चुके हैं. दो दशक से राजा भैया समाजवादी पार्टी के वॉकओवर से कुंडा में जीतते रहे हैं. लेकिन, इस बार उनकी राह कठिन है.
सारथी को चुनौती देने के मूड में
यूपी की
सियासत में काफी लंबे वक्त तक राजा भैया के समाजवादी पार्टी के साथ अच्छे रिश्ते रहे.
उन्हें समाजवादी पार्टी का सारथी तक कहा जाता था. 2012 में सीएम अखिलेश यादव के नेतृत्व
में बनी समाजवादी पार्टी की सरकार में खाद्य व नागरिक आपूर्ति मंत्री भी रहे थे.
जबकि उस साल वे निर्दलीय विधायक के रूप में चुनाव जीते थे. राजा भैया समाजवादी
पार्टी के जनक मुलायम सिंह के प्रति खास सम्मान अक्सर ही जताते रहते हैं और शिवपाल
से भी उनके रिश्ते अच्छे रहे हैं. पर इस बार समाजवादी पार्टी से उनके पुराने
रिश्ते काम नहीं आते दिख रहे हैं और समाजवादी पार्टी उन्हें गढ़ में ही चुनौती
देने के मूड में दिख रही है.
अखिलेश बोले थे- 'कौन हैं यह राजा भैया..,
रघुराज
प्रताप सिंह उर्फ़ रजा भैया को लेकर समाजवादी पार्टी व अखिलेश यादव की नाराजगी तब
सामने आई जब अखिलेश यादव ने एक बयान में उन्हें पहचानने से इनकार कर दिया था.
अखिलेश यादव से पत्रकारों ने राजा भैया से गठबंधन के बारे में पूछा-तो उन्होंने
कहा कि 'कौन हैं यह..., किसके बारे में बात कर रहे हो...' राजा भैया के समाजवादी पार्टी प्रमुख
अखिलेश से रिश्ते खराब होने का प्रभाव उन पर देखा जा सकता था. उन्होंने मुलायम
सिंह को जन्मदिन पर जाकर बधाई देकर अखिलेश की नाराजगी दूर करने की कोशिश की,पर कुछ नहीं हुआ. अब समाजवादी
पार्टी के कुंडा में प्रत्याशी खड़ा करने से लगता है अखिलेश यादव ने चुनाव में
राजा भैया को सबक सिखाने की ठान ली है.
बनते बिगड़ते
रिश्ते
समाजवादी
पार्टी के अलावा अन्य पार्टियों की बात करें तो
अन्य पार्टियों से भी राजा भैया का साथ बनता बिगड़ता रहा है. वह बीजेपी की कल्याण
सिंह सरकार से लेकर राम प्रकाश गुप्ता और राजनाथ सिंह की सरकार में मंत्री रहे, पर साल 2002 में बीजेपी नेता
पूरन सिंह बुंदेला ने उन पर कथित तौर पर अपहरण और धमकी देने के आरोप लगाते हुए
मामला दर्ज करवाया था. बसपा से तो उनकी काफी ठनी रही है. मायावती जब मुख्यमंत्री थीं तो उन्होंने रघुराज प्रताप सिंह को
गिरफ्तार करवाया था. बाद में मायावती की सरकार ने राजा भैया को आतंकवादी घोषित कर
दिया था और राजा भैया, उनके पिता उदय प्रताप सिंह और चचेरे भाई
अक्षय प्रताप सिंह पर पोटा कानून लगाकर जेल में डाल दिया था. मायावती सरकार ने
उनके पिता के महल और उनकी बेंती कोठी पर भी छापेमारी करवाई थी. इन सबके बीच राजा
भैया की राजनीति की गाढ़ी निर्बाध चलती रही. 2002, 2007, 2012
के बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के
तौर लगातार छठी बार कुंडा विधानसभा से जीते. साल 2018 में उन्होंने जनसत्ता दल लोकतांत्रित नाम की अपनी
राजनीतिक पार्टी बनाई. उनकी इस नई पार्टी को चुनाव आयोग ने "आरी" चुनाव
चिन्ह आवंटित किया है.
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