आज गंगा में मछुआरों ने दुर्लभ प्रजाति के कई कछुओं को पकड़ा। रंग-बिरंगे इन कछुओं का वजन 80 ग्राम तक था। इसके शरीर का ज्यादातर हिस्सा गुलाबी रंग का था। वहीं इनकी जांच-परख कर वापस से गंगा में डाल छोड़ दिया गया। वाराणसी से 10 किलोमीटर की दूरी पर मुगलसराय स्थित कुंडा कला गांव में मछुआरों द्वारा मछली पकड़ते हुए जाल में ये रंग-बिरंगे कछुए भी फंस गए। विशेष रंग वाले कछुओं को देख उन्होंने तत्काल गंगा प्रहरी दर्शन निषाद को सूचित किया।
कछुओं का अधिकतम वजन 40 किलोग्राम तक
दर्शन ने विशेषज्ञों की मदद से बताया कि यह कछुआ IUCN की रेड लिस्ट में शामिल है। इस कछुआ को तिलहारा कछुआ (पंगशुरा ट्रेक्ट) कहा जाता है। इन्हें करीब 20 साल बाद यहां पर देखा जा रहा है। ये गंगा के ऊपरी, मध्य और निचले तीनों हिस्सों में पाए जाने वाले कठोर आवरण के कछुए हैं। कछुओं के इस प्रजाति का वजन अधिकतम 30-40 किलोग्राम तक होता है। इनकी पीठ ठोस छतनुमा होती है, जिस पर नुकीली कील की तरह से संरचनाए बनी होती हैं। यह अमूमन नदियों में ही पाए जाते हैं। ये सर्वाहारी होते हैं और मेंढक टैडपोल, मछली, केचुआ, केकड़ा, कीड़े जल कीड़े और वनस्पतियों को ही खाते हैं।
अब कछुओं की महज 13 प्रजातियां ही पाई जाती है भारत में
दर्शन ने बताया कि उन्हें देहरादून स्थित वन्य जीव संस्थान से कछुआ संरक्षण का प्रशिक्षण प्राप्त है। दर्शन ने बताया कि दुनिया में कुल 235 प्रकार के कछुएं मिलते हैं, इनमें से भारत में 35 प्रजातियां अब तक देखी जा चुकी हैं, वहीं वर्तमान में केवल 13 प्रजातियां ही मिलती हैं। कछुए गंगा में उत्तर प्रदेश और बिहार के बीच में ही पाए जाते हैं। भारतीय वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972 के अनुसार इस कछुए का शिकार करना या इनकी स्मगलिंग करने पर रोक लगाई गई है। दर्शन ने बताया कि गंगा में इस समय कई तरह के विशिष्ट जलीय जीव दिखाई दे रहे हैं। वहीं गंगा में डॉल्फिन इस समय काफी बच्चे दे रही हैं, जिससे इनकी भी संख्या में बढ़ोतरी होनी तय है।

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