वाराणसी: विकास खंड चिरईगांव की ग्रामसभा पुरनपट्टी में मुख्यमंत्री वनवासी आवास योजना को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि वर्ष 2023-24 में तीन वनवासी लाभार्थियों को आवास स्वीकृत किए गए, लेकिन वर्षों बाद भी आवास पूर्ण नहीं हो सके। इसके बावजूद लाभार्थियों को आवास की पूरी धनराशि और मजदूरी का भुगतान किए जाने की बात सामने आई है।
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जानकारी के मुताबिक, मेवा वनवासी, सेवा वनवासी और रमेश वनवासी को मुख्यमंत्री वनवासी आवास योजना के तहत आवास का लाभ मिला था। लेकिन मौके की स्थिति को लेकर सवाल यह है कि इन आवासों का निर्माण अभी तक पूरा नहीं हुआ है। खासतौर पर तीनों आवासो में अभी तक छत का निर्माण नहीं होने की बात सामने आई है। इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल सरकारी व्यवस्था पर खड़ा होता है। आवास निर्माण की प्रगति की निगरानी ग्राम पंचायत सचिव, सेक्टर प्रभारी और खंड विकास अधिकारी स्तर से किए जाने की व्यवस्था बताई जाती है। वहीं निर्माण की विभिन्न अवस्थाओं पर जियो टैगिंग भी की जाती है।
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ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब आवास मौके पर पूर्ण नहीं हुआ तो उसकी निर्माण प्रगति किस आधार पर दर्ज हुई और भुगतान की प्रक्रिया कैसे पूरी हो गई? अगर वास्तव में आवास अधूरे हैं और पूरी धनराशि का भुगतान हो चुका है, तो इसकी जिम्मेदारी सिर्फ लाभार्थियों की है या निगरानी और सत्यापन करने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए यह जांच का विषय है। आवास योजना में निर्माण की प्रगति को दर्ज करने के लिए अलग-अलग चरणों में जियो टैगिंग की जाती है। ऐसे में यह मामला और भी गंभीर सवाल खड़े करता है कि जियो टैगिंग में आवास की वास्तविक स्थिति क्या दर्ज की गई थी? यदि जियो टैगिंग के दौरान आवास अधूरा था, तो भुगतान आगे कैसे बढ़ा? और यदि जियो टैगिंग में निर्माण पूर्ण दिखाया गया, तो मौके पर आवास अधूरा क्यों मिला? इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
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मामले को लेकर जब खंड विकास अधिकारी/ज्वाइंट मजिस्ट्रेट रिया सैनी से जानकारी ली गई तो उन्होंने प्रारंभ में कहा कि लाभार्थियों को पैसा मिल चुका है और यदि उन्होंने आवास नहीं बनवाया तो विभाग क्या कर सकता है। हालांकि, जब उन्हें आवास की वास्तविक स्थिति और भुगतान से संबंधित पूरी जानकारी से अवगत कराया गया तो उन्होंने मामले की जांच कराने की बात कही। अब सवाल यह है कि जांच में क्या सामने आता है? क्या लाभार्थियों को भुगतान के बावजूद आवास निर्माण पूरा नहीं कराने के लिए जिम्मेदार माना जाएगा, या भुगतान और सत्यापन की प्रक्रिया में भी किसी स्तर पर लापरवाही सामने आएगी?
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मुख्यमंत्री वनवासी आवास योजना का उद्देश्य जरूरतमंद वनवासी परिवारों को पक्का आवास उपलब्ध कराना है। ऐसे में यदि धनराशि का भुगतान हो जाने के बावजूद आवास अधूरे हैं, तो मामला केवल एक अधूरे मकान का नहीं बल्कि सरकारी धन के उपयोग और निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता का भी है। अब देखना होगा कि जांच के बाद विभाग इस मामले में क्या कार्रवाई करता है और आवास अधूरे रहने तथा भुगतान की प्रक्रिया में जिम्मेदारी किसकी तय होती है?
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