श्रीनगर: जम्मू और कश्मीर प्रशासन नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के सामने यह मानने के बाद कड़ी न्यायिक जांच के दायरे में आ गया है कि इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए जरूरी अनिवार्य पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति जमा किए बिना 82,000 से ज़्यादा जंगल के पेड़ काट दिए गए, जिससे 45 करोड़ रुपये से अधिक का बकाया रह गया.
यह भी पढ़ें: वाराणसी में चाइनीज मांझे का जानलेवा आतंक; दुर्गाकुंड में हेलमेट के बावजूद युवती का चेहरा कटा, लोहता में युवक गंभीर रूप से घायल
यह खुलासा रसिख रसूल भट बनाम केंद्र शासित प्रदेश जम्मू और कश्मीर मामले की कार्यवाही के दौरान किया गया, जिसकी सुनवाई ट्रिब्यूनल ने 13 जनवरी, 2026 को की थी. जम्मू और कश्मीर के मुख्य सचिव की दी गई अनुपालन रिपोर्ट में, केंद्र शासित प्रदेश ने माना कि जंगल वाले इलाकों में किए गए लगभग 150 प्रोजेक्ट्स में 82,327 पेड़ काटे गए. रिपोर्ट में कहा गया है कि इन प्रोजेक्ट्स से होने वाली कुल प्रतिपूरक वनीकरण दायित्व 80.73 करोड़ रुपये है, जिसमें से 45.33 करोड़ रुपये अभी तक भुगतान नहीं किए गए हैं.
पर्यावरण कानून के तहत, जंगल की जमीन के दूसरे इस्तेमाल से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई के लिए मुआवजे के तौर पर पेड़ लगाने का भुगतान जरूरी है. इस बात को मानने से प्रशासन के वन एक्ट, 1980 के पालन पर सवाल उठे हैं, जिसमें यह जरूरी है कि जंगल की जमीन को गैर-वन कामों के लिए इस्तेमाल करने से पहले उपयोगकर्ता एजेंसियां मुआवज़े के तौर पर ली जाने वाली लेवी जमा करें.
यह भी पढ़ें: लुठाकला में अवैध खनन पर छापा, प्रदीप यादव गिरोह का ट्रैक्टर-ट्राली सीज
केंद्र शासित प्रदेश के अनुसार, यह चूक 30 जुलाई, 2019 को पहले की राज्य प्रशासनिक काउंसिल द्वारा लिए गए पॉलिसी फैसले की वजह से हुई है. उस फैसले ने 2014 के कैबिनेट ऑर्डर को बदल दिया और सरकार को जंगल की जमीन के डायवर्जन के लिए मंज़ूरी देने की इजाजत दे दी, भले ही मुआवजे का भुगतान पेंडिंग हो. अधिकारियों ने कहा कि इस कदम का मकसद सार्वजनिक अवसंरचना के कामों को तेजी से पूरा करना था.
हालांकि, याचिकाकर्ता, पर्यावरणविद् और अधिवक्ता रसिख रसूल भट ने पॉलिसी में इस बदलाव का कड़ा विरोध किया है. 8 जनवरी, 2026 को ट्रिब्यूनल के सामने दायर की गई आपत्तियों में, भट ने तर्क दिया कि यह फैसला मनमाना था और कानूनी पर्यावरण सुरक्षा उपायों को कमजोर करता है.
यह भी पढ़ें: विकास प्राधिकरण के सचिव ने भूमि अधिग्रहण के संबंध में नेवादा के किसानों के साथ बैठक कर दी धमकि
उन्होंने कहा कि इस छूट से पर्यावरण के नुकसान को रोकने के बजाय, बाद में जंगल कानून के उल्लंघन को सही ठहराया गया. भट्ट ने कहा कि मुआवजा देने का तरीका फॉरेस्ट क्लीयरेंस की एक मुख्य जरूरत है और इसे मंज़ूरी के बाद की औपचारिकता नहीं माना जा सकता.
ट्रिब्यूनल की नजर में आने वाले खास प्रोजेक्ट्स में से एक उत्तर कश्मीर में हंदवाड़ा-बंगस रोड है, जो पर्यावरण के रूप से संवेदनशील राजवार फॉरेस्ट रेंज से होकर गुजरता है. इस सड़क का काम लोक निर्माण विभाग कर रहा है. याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि प्रोजेक्ट पर कंस्ट्रक्शन 2017 में शुरू हुआ था, जो सितंबर 2019 में अंतिम वन मंजूरी मिलने से लगभग दो साल पहले था.
हालांकि प्रशासन ने ट्रिब्यूनल के सामने माना कि 488 पेड़ सही मंज़ूरी लेकर काटे गए थे, लेकिन उसने यह भी माना कि 2021 में गैर-कानूनी तरीके से पेड़ काटे गए थे, जिसके लिए बाद में नुकसान की भरपाई की गई. भट ने आगे कहा कि ऐसे प्रोजेक्ट्स ने राजवार इलाके में इंसान-जानवरों के बीच टकराव को बढ़ा दिया है.
यह भी पढ़ें: अभी नहीं निकली ठंड की हवा, इस साल 6-6 घंटे में 11 डिग्री तक बदला पारा; धूप से पारा 24 डिग्री
उन्होंने बताया कि जंगल के प्रस्तावों में खुद इलाके में जंगली जानवरों की मौजूदगी दर्ज थी, फिर भी कहा जाता है कि प्रोजेक्ट्स बिना बड़े वाइल्डलाइफ मैनेजमेंट या नुकसान कम करने की योजना के आगे बढ़े. सुनवाई के दौरान केंद्र शासित प्रदेश की ओर से पेश वकील ने मुख्य सचिव की अनुपालन रिपोर्ट के खिलाफ उठाई गई आपत्तियों का जवाब देने के लिए चार सप्ताह का समय मांगा.
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की प्रधान पीठ, जिसके चेयरमैन जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव हैं, ने सभी पार्टियों को अपनी दलीलें पूरी करने और जरूरी रिपोर्ट रिकॉर्ड पर रखने का निर्देश दिया. ट्रिब्यूनल ने मामले की आखिरी सुनवाई 9 अप्रैल, 2026 को तय की है।
यह भी पढ़ें: मुंहबोला भाई ने महिला से की ठगी :- वाराणसी में गिफ्ट के नाम पर छह लाख रुपये लिए, FIR दर्ज